रूबरू | Part 16 | Rubaru – A Hindi Story of Love and Relationships

ताबिश सोफे से उठा... और धीरे-धीरे उसके करीब आया।

कमरे में एक अजीब सा सन्नाटा फैल गया।

मायरा को माहौल बहुत ही अजीब लगा।

मैं दादी के पास जा रही हूं। कहते हुए वह बाहर की ओर बढ़ी।

अभी हमारी बात खत्म नहीं हुई, ताबिश ने आगे बढ़ते हुए कहा।

आपको जो भी बात करना है बाद में कर लिजिएगा। अभी मुझे दादी के पास रहना ज़्यादा ज़रूरी है। उनकी दवा का वक्त हो रहा है।

कहते हुए मायरा तेज़ी से बाहर निकल गई। 

ताबिश वहीं खड़ा रह गया। उसके चेहरे पर गुस्सा और हैरानी दोनों थे।

मैं उसे रोक क्यों नहीं पाया? 

उसने मेरी बात नहीं मानी...मेरे सामने किसी की हिम्मत नहीं कि मेरी बात काटे...

और यह लड़की...उसने हाथों की मुठ्ठी कस ली।

अपने सवालों में ताबिश खुद ही उलझ गया।

वह तेज़ी से बाहर निकल गया।

...

डाइनिंग टेबल पर बैठते ही ताबिश इधर-उधर देखता है।

दादी पहले से ही वहां मौजूद थीं।

आपकी चहेती कहीं नज़र नहीं आ रही, ताबिश के होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई।

मायरा किचन में खाना खा रही है। दादी धीरे से बोलीं।

सॉरी दादी...अगर आप उसे अपने साथ बैठाना चाहती हैं तो बुला लीजिए। मुझे कोई दिक्कत नहीं। उस दिन वाली बात पर ताबिश थोड़ा शर्मिंदा हुआ।

नहीं कोई बात नहीं... तुम खाना खाओ। दादी ने बात खत्म कर दी।

आप नाराज़ तो नहीं हैं ना? ताबिश उठकर दादी के पास गया और उनके गले में बाहें डाल दी।

तुम्हें लगता है मैं तुम से नाराज़ हो सकती हूं? दादी ने गर्दन घुमाकर प्यार से उसे देखा।

मैं जानता हूं आप मुझसे नाराज़ नहीं हो सकतीं। लेकिन मेरी पिछली बातें आपको गलत लगी होगी। ताबिश थोड़ा झुककर उनकी ओर देखता है।

मुझे खुशी है कि तुम्हें अपनी गलती का एहसास है। मेरे लिए यही काफी है। दादी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

बैठो खाना खाओ...ठंडा हो रहा है। वह कुर्सी की ओर इशारा करती हैं।

दादी आज आप ठीक से नहीं खा रहीं?... ताबिश उनको धीरे-धीरे खाता देख परेशान हुआ।

आज तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही। खाने का मन नहीं हो रहा। दादी अपनी प्लेट में चावल रखते हुए कहती हैं।

कुछ और लेंगी? वह परेशान हुआ।

नहीं, यही काफी है। वह उसे मना कर गईं।

वह दोनों खाना खा ही रहे थे कि मायरा आ गई।

उनको खाते देख वह दूर खड़ी रह गई।

दादी और ताबिश दोनों ने उसे देखा। मगर दोनों ही खामोश रहे।

लॉन में चलें? दादी के उठते ही मायरा उनके करीब आकर उनका हाथ पकड़ लेती है।

नहीं, आज शनिवार है...दादी से पहले ताबिश बोल पड़ा।

तो...वह हैरान थी। लॉन का शनिवार से क्या मतलब भला?...

सैटरडे को यह हमें मूवी दिखाता है। दादी हंसी...उनकी हंसी बहुत ही प्यारी थी।

होम थियेटर चलो...दादी आगे बढ़ीं। मायरा उनके साथ थी।

उसे नहीं पता था कि यह होम थियेटर कहां है। वह दादी के साथ चलती रही।

एक दरवाज़े के पास जाकर दादी रूक गईं।

पीछे से ताबिश आगे आकर दरवाज़ा खोलता है। अंदर जाकर पहले लाइट जलाता है।

वह दोनों भी अंदर चली गई।

इतना शानदार होम थियेटर उसने पहले कभी नहीं देखा था।

पच्चीस आरामदेह कुर्सियां, परफेक्ट लाइट और स्कीन।

दादी आगे जाकर एक कुर्सी पर बैठ गईं।

ताबिश उनके बगल वाली कुर्सी पर बैठ गया।

दादी मैं जाऊं?...मायरा झिझकते हुए बोली।

बैठै तुम भी...दादी से पहले ताबिश बोल पड़ा।

मायरा ने दादी की तरफ देखा। दादी ने आंखों से बैठने का इशारा किया।

वह माहौल खराब नहीं करना चाहती थी। इसलिए खामोशी से बैठ गई।

मूवी शुरू होते ही कमरा अंधेरा हो गया।

दादी आराम से कुर्सी पर टेक लगाकर फिल्म देखने लगीं।

बालीवुड मूवी थी। हर किसी की नज़र स्क्रीन पर थी। 

दादी बीच में बैठी थीं।  उनके एक तरफ ताबिश और दूसरी तरफ मायरा थी।

तुमको बालीवुड मूवी पसंद है? दादी ने अचानक से धीमी आवाज़ में पूछा।

पसंद है... लेकिन देखने का वक्त नहीं मिलता। मायरा ने सच्चाई से कहा।

क्यों? वक्त निकालना चाहिए। ताबिश को ही देख लो। यह भी मसरूफ रहता है। लेकिन फिर भी वक्त निकालता है।

जी दादी अब कोशिश करूंगी। वह जल्द उनकी बात मान लेती है।

उसकी बात पर दादी मुस्कुरा दी।

मायरा भी मुस्कुरा दी। लेकिन ताबिश की उपस्थिति अभी भी उसे अजीब सा एहसास दे रही थी।

ताबिश के कान भी उनकी बातों में लगे थे। लेकिन नज़र स्क्रीन पर ही रखी। 

फिल्म आगे बढ़ती रही। अचानक दादी कुछ बेचैन हुईं।

दादी...आप ठीक तो हैं? मायरा ने तुरंत नोटिस किया।

बस...थोड़ी थकान लग रही है। दादी ने धीरे से सिर हिलाया, लेकिन उनकी आवाज़ थोड़ी कमज़ोर थी।

दादी, चलिए मैं आपको कमरे तक छोड़ देता हूं। ताबिश तुरंत उठ खड़ा हुआ।

नहीं बेटा, फिल्म देखो तुम लोग। मैं अब आराम करूंगी। दादी उठने की कोशिश करने लगीं।

मैं चलती हूं आपके साथ। मायरा ने तुरंत उनका हाथ थाम लिया।

ताबिश ने मायरा की तरफ देखा। इस बार उसकी नज़र में नाराज़गी नहीं थी। बल्कि कुछ और ही था। मायरा ने नज़रें झुका लीं।

बैठो ताबिश, दादी के आवाज़ में पहले जैसी मज़बूती नहीं थी, लेकिन फिर भी प्यार भरा आदेश था।

मैं छोड़ आती हूं। आप बैठें। मायरा आगे हुई।

ताबिश एक नज़र उसे देखकर पास रखा बज़र दबाता है। उसी वक्त एक लड़की आती है।

दादी को इनके कमरे में ले जाएं। ताबिश ने उसे हुक्म दिया।

वह दादी का हाथ पकड़कर धीरे-धीरे बाहर ले गई।

होम थियेटर का दरवाज़ा बंद होते ही अंदर सिर्फ फिल्म की आवाज़ रह गई। 

मायरा और ताबिश अब अकेले थे। बीच की कुर्सी खाली थी।

स्क्रीन पर फिल्म चल रही थी, लेकिन मायरा का ध्यान पूरी तरह बिखरा हुआ था।

उसका मन कभी दादी में तो कभी ताबिश के रवैए में उलझा हुआ था।

ताबिश चुपचाप फिल्म देख रहा था।

मायरा ने धीरे से उठने की कोशिश की।

कहां जा रही हो? ताबिश की नज़रें स्क्रीन पर थी।

मायरा डर गई। 

मैं...दादी को देख लेती हूं। कहते हुए वह कांप गई। पहली बार उसे ताबिश से डर लगा।

वह सो रही होंगी। उनको आराम की ज़रूरत है। तुम जाकर भी कुछ नहीं कर सकती।

मायरा रूक गई। उसके पास कोई जवाब नहीं था। वह धीरे से वापस बैठ गई।

वह वहां से भाग जाना चाहती थी। लेकिन उसके पास जाने का कोई बहाना नहीं था।

तभी दरवाज़े पर नॉक हुआ।

रहीमन ट्राली लेकर अंदर आई। उनके सामने ट्राली रोक कर खड़ी हो गई।

ताबिश ने इशारा किया। रहीमन कॉफी निकाल कर पहले ताबिश को देती है फिर मायरा की तरफ मग करती है। 

वह भी खामोशी से थाम लेती है। क्योंकि इस वक्त कुछ बोलना अपनी ही इज़्ज़त गंवाना था। और वह अपनी इज़्ज़त गंवाना नहीं चाहती थी।

ताबिश के इशारा करते ही रहीमन बाहर चली गई।

होम थियेटर में सिर्फ फिल्म की आवाज़े चल रहीं थीं। लेकिन मायरा का ध्यान कहीं और था। बीच की खाली कुर्सी जैसे उसे बार-बार याद दिला रही थी कि ताबिश सिर्फ दो सीट दूर बैठा है।

वह अपने कॉफी का मग दोनों हाथों से थामें हुए थी। गर्मी उसके हाथों में चुभ रही थी। लेकिन वह छोड़ भी नहीं सकती थी। कुछ तो करना था हाथों को व्यस्त रखने के लिए।

डर क्यों लग रहा है तुम्हें?... ताबिश ने एक घूंट लिया और धीरे से बोला। हालांकि नज़र अभी भी स्क्रीन पर थी।

क्या?...उसकी आवाज़ मुश्किल से निकली।

मुझसे डर लग रहा?...ताबिश ने सिर घुमाकर उसकी तरफ देखा।

मुझे डर नहीं लग रहा। मायरा ने नज़र झुका लीं।

अच्छा, तो फिर तुम्हारा ध्यान कहां हैं?...वह अचानक से उठ कर दादी वाली खाली चेयर पर बैठ गया। और उसकी तरफ झुक गया।

जारी है...

रूबरू भाग 15

रूबरू भाग 17










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